Monday, June 22, 2009

हाशिये पर ज़िन्दगी.!!


सिनेमा और साहित्य समाज का आइना होते हैं..फ़िल्म वाले कहते हैं की "हम वो दिखाते हैं जो समाज में होता है वहीं लेखक कहता है की हम वो लिखते हैं जो हमारे आस पास घटित होता है...बस फर्क इतना होता है की समाज के सच को सिल्वर स्क्रीन पर तस्वीरों के जरिये कल्पनाओं की चाशनी से तर करके परोसा जाता है ....समाज की हकीक़त सिनेमा के परदे पर जब अपने साजो सामान के साथ उभरती है तो देखने वाला उसमे डूब जाता है......परदे पर दिखने वाली कहानी अगर उसके आस पास हुई तो उसे वो सच सी लगने लगती है .....
सात समुंदर पार से सपनो को बेचने वाला एक सौदागर हिन्दुस्तान आया ...चमकती दमकती मायानगरी मुंबई में रुका और यहाँ की बस्ती के सच को सिनेमा के परदे पर दिखा गया जिससे हम हिन्दुस्तानी अक्सर कतराते हैं.......उसने कैमरे की आँख से हमारे उस ज़ख्म को हरा कर दिया जिसे हम छुपाते फिर रहे हैं या जानबूझकर नज़रअंदाज करते आए हैं..........उसने एक नया सपना उन सभी को दे दिया जिसकी कल्पना भी उन्होंने न की होगी......उसने इन निराश आंखों को सपने दे दिए ....एक नया घर बनाने की.......
भारत के हर बड़े शहर के भीतर झुग्गियां आबाद हैं.....चाहे वो मुंबई हो,दिल्ली हो या देहरादून....इन शानदार शहरों के लिए ये झुग्गियां मखमल के थान में टाट के पैबंद की तरह हैं..ज़िन्दगी यहाँ भी मुस्कुराती है.लेकिन शायद इसे जीना नही कह सकते.....कसमसाती हुई इंसानी ज़िन्दगी यहाँ इंसान के जिस्म पर भारीभरकम बोझ सी लगती है.....ऐसी ही एक बस्ती से मेरा सामना हुआ.....
बिंदास पुल के नीचे आबाद ये मलिन बस्ती मुंबई के धारावी जैसी तो नही लेकिन यहाँ रहने वाले करीब वैसे ही हैं ......ज़िन्दगी जीने का मतलब ज़ंग लड़ने से कम नही.....हसीं सपने तो यहाँ शायद ही किसी की आंखों ने देखे हों.........यहाँ तो न रोटी मयस्सर है न ही सर छुपाने को छत .....ख्वाब तो तब बुने जाते हैं जब वक्त हो ....यहाँ तो वक्त रोटी की तलाश में ही गुजर जाता है.............पेट की आग के सुलगे हुए अलाव को किसी तरह बुझाना यहाँ की पहली जरुरत है.......लेकिन बावजूद इसके यहाँ के लोग सपना देख रहे हैं........ऐसा सपना जो बहुत बड़ा नही है......ये सपना उस बुनियादी जरुरत से जुडा है जो हर इंसान का एक हक है....
यहाँ भी ऐसे बच्चे हैं जो फिल्मों के किसी नायक की तरह करोड़पति बनने का ख्वाब सजाये घूम रहे है.......लेकिन इन बस्तियों की हकीक़त फिल्मों से कोसो दूर है......क्योंकि फिल्मों की हकीक़त असल ज़िन्दगी के लिए नही...... जब पेट भरने का ही कोई जुगाड़ नही है तो यहाँ यहाँ इन बच्चों के माँ बाप को उम्मीद भी नही की अपने औलादों को तालीम के लिए कभी इस बस्ती की देहलीज से बाहर निकाल पायेंगे.............यहाँ तो बच्चा होश सँभालते ही परिवार का बोझ उठाने लगता है.......ढाबों के जूते बर्तन साफ़ करते करते उसके हाथों की रेखाएं ही मिट जाती हैं .....लेकिन उनके छोटे से आशियाने का ख्वाब पुरा नही हो पता जो इस बस्ती में पाँव रखते ही देखा था......
ऐसे में उन्हें भी इंतज़ार है एक ऐसे रहनुमा की जो आए और उन्हें "slumdog millionaire" की तरह ही पल में सारे ख्वाब पुरे करके चला जाए........लेकिन क्या कभी पुरा हो पायेगा इनका ये अधुरा ख्वाब..????

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